शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

मानव उत्सर्जन तंत्र (Human Excretory System): वृक्क की संरचना, कार्य और मूत्र निर्माण की प्रक्रिया

Excretory System Project: वृक्क की संरचना, कार्य और मूत्र निर्माण प्रक्रिया

पृष्ठ 1: आवरण पृष्ठ (Cover Page)

(महाविद्यालय/विश्वविद्यालय का नाम)

(विभाग का नाम: प्राणीशास्त्र विभाग)

सत्र: 2025-2026

विषय (Topic): मानव में मूत्र निर्माण की क्रियाविधि (Mechanism of Urine Formation in Humans)

विषय (Subject): प्राणीशास्त्र (Zoology)

जमाकर्ता (Submitted by):

छात्र का नाम: _________________________

कक्षा: B.Sc. Zoology

रोल नंबर: _________________________

जमा करने हेतु (Submitted to):

प्रोफेसर का नाम: _________________________

(जमा करने की तिथि)



पृष्ठ 2: परिचय (Introduction)

1. परिचय (Introduction)

सभी जीवित प्राणियों की तरह, मानव शरीर भी एक जटिल रासायनिक फैक्ट्री (complex chemical factory) है, जिसमें निरंतर चयापचयी क्रियाएं (metabolic activities) होती रहती हैं। इन क्रियाओं के दौरान, उपयोगी पदार्थों के साथ-साथ कुछ हानिकारक और विषैले अपशिष्ट पदार्थ (toxic waste products) भी बनते हैं, जैसे यूरिया, यूरिक एसिड, और क्रिएटिनिन (urea, uric acid, and creatinine)।

उत्सर्जन (Excretion) वह जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा शरीर इन हानिकारक चयापचयी अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालता है। यदि इन पदार्थों को शरीर से समय पर नहीं हटाया गया, तो ये जमा होकर शरीर के आंतरिक वातावरण को विषाक्त बना सकते हैं, जिससे कोशिकाओं और ऊतकों (cells and tissues) को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है और अंततः मृत्यु भी हो सकती है।

मानव में, उत्सर्जन का कार्य मुख्य रूप से उत्सर्जन तंत्र (Excretory System) द्वारा किया जाता है, जिसका सबसे महत्वपूर्ण अंग वृक्क (Kidney) है। वृक्क न केवल अपशिष्ट पदार्थों को छानकर मूत्र (urine) के रूप में बाहर निकालता है, बल्कि यह शरीर में जल, लवणों और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन (osmoregulation) बनाए रखने तथा रक्त के pH को नियंत्रित करने में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस प्रकार, वृक्क शरीर के आंतरिक वातावरण की स्थिरता, जिसे होमियोस्टैसिस (Homeostasis) कहते हैं, को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है।

यह असाइनमेंट वृक्क की संरचना और मूत्र निर्माण की जटिल क्रियाविधि को विस्तार से समझाएगा।

पृष्ठ 3: वृक्क की कार्यात्मक शारीरिक रचना (Functional Anatomy of Kidney)

2. वृक्क की कार्यात्मक शारीरिक रचना

मानव में एक जोड़ी वृक्क होते हैं, जो सेम के बीज के आकार के गहरे लाल-भूरे रंग के अंग हैं। ये उदर गुहा (abdominal cavity) में रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर स्थित होते हैं। प्रत्येक वयस्क वृक्क लगभग 10-12 cm लंबा, 5-7 cm चौड़ा और 2-3 cm मोटा होता है।

वृक्क की आंतरिक संरचना को दो स्पष्ट क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है:

  • वल्कुट (Cortex): यह बाहरी, दानेदार दिखने वाला भाग है। इसमें अधिकांश नेफ्रॉन के ग्लोमेरुलस (glomerulus) और नलिकाकार भाग (tubular parts) स्थित होते हैं।

  • मध्यांश (Medulla): यह आंतरिक भाग है जो कई शंक्वाकार पिरामिड (conical pyramids) में बंटा होता है। इन पिरामिडों के बीच कॉर्टेक्स के विस्तार को बर्टिनी के स्तंभ (Columns of Bertini) कहा जाता है।

नेफ्रॉन (Nephron): नेफ्रॉन वृक्क की संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाई (structural and functional unit) है। प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख (1 million) नेफ्रॉन होते हैं। यही वह स्थान है जहाँ रक्त को छाना जाता है और मूत्र का निर्माण होता है।

एक नेफ्रॉन के मुख्य भाग निम्नलिखित हैं:

  1. ग्लोमेरुलस (Glomerulus): यह अभिवाही धमनिका (afferent arteriole) और अपवाही धमनिका (efferent arteriole) से बनी रक्त केशिकाओं (blood capillaries) का एक घना गुच्छा है। यहीं पर रक्त का निस्पंदन (filtration) होता है।

  2. बोमन सम्पुट (Bowman's Capsule): यह ग्लोमेरुलस को घेरे हुए एक कप के आकार की संरचना है। ग्लोमेरुलस और बोमन सम्पुट को मिलाकर मैल्पीघियन काय (Malpighian body) या रीनल कॉर्पसल (Renal corpuscle) कहते हैं।

  3. वृक्क नलिका (Renal Tubule): यह बोमन सम्पुट से निकलने वाली एक लंबी, कुंडलित नलिका है, जिसके निम्नलिखित भाग हैं:

  • समीपस्थ कुंडलित नलिका (Proximal Convoluted Tubule - PCT): यह बोमन सम्पुट के पास का अत्यधिक कुंडलित भाग है।

  • हेनले का लूप (Loop of Henle): यह एक 'U' आकार की नलिका है जिसमें एक अवरोही भुजा (descending limb) और एक आरोही भुजा (ascending limb) होती है।

  • दूरस्थ कुंडलित नलिका (Distal Convoluted Tubule - DCT): यह नलिका का अंतिम कुंडलित भाग है।

  1. संग्राहक नलिका (Collecting Duct): कई नेफ्रॉन की DCT एक सामान्य संग्राहक नलिका में खुलती है, जो अंत में वृक्कीय पेल्विस (Renal Pelvis) में मूत्र ले जाती है।

पृष्ठ 4: मूत्र निर्माण की क्रियाविधि (Mechanism of Urine Formation)

3. मूत्र निर्माण की क्रियाविधि

मूत्र निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें तीन मुख्य चरण शामिल होते हैं:

  1. परानिस्यंदन (Glomerular Filtration or Ultrafiltration)

  2. चयनात्मक पुनरावशोषण (Selective Reabsorption)

  3. नलिकीय स्रावण (Tubular Secretion)

Image: https://stock.adobe.com/images/formation-of-urine-vector-illustration-labeled-creation-process-explanation/348508225

Source: adobe stock
फ्लोचार्ट: मानव में मूत्र निर्माण की प्रक्रिया

graph TD
    A[रक्त अभिवाही धमनिका (Afferent Arteriole) के माध्यम से ग्लोमेरुलस में प्रवेश करता है] --> B{चरण 1: परानिस्यंदन (Ultrafiltration)};
    B --> C[ग्लोमेरुलस में उच्च दाब के कारण रक्त का निस्पंदन];
    C --> D[प्रोटीन और रक्त कोशिकाओं को छोड़कर प्लाज्मा का अधिकांश भाग छनकर बोमन सम्पुट में आता है --> इसे ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेट कहते हैं];
    D --> E{चरण 2: चयनात्मक पुनरावशोषण (Selective Reabsorption)};
    E --> F[फिल्ट्रेट वृक्क नलिका (PCT, हेनले लूप, DCT) से गुजरता है];
    F --> G[उपयोगी पदार्थ जैसे ग्लूकोज, अमीनो एसिड, विटामिन, जल और आयन वापस रक्त में अवशोषित हो जाते हैं];
    G --> H{चरण 3: नलिकीय स्रावण (Tubular Secretion)};
    H --> I[रक्त से अपशिष्ट पदार्थ जैसे H+, K+, अमोनिया और कुछ दवाएं सक्रिय रूप से फिल्ट्रेट में स्रावित की जाती हैं];
    I --> J[अंतिम तरल पदार्थ मूत्र (Urine) कहलाता है, जो संग्राहक नलिका में एकत्र होता है];
    J --> K[मूत्र वृक्कीय पेल्विस से होते हुए मूत्राशय में संग्रहीत होता है];


3.1 परानिस्यंदन (Glomerular Filtration)

यह मूत्र निर्माण का पहला चरण है, जो ग्लोमेरुलस में होता है। ग्लोमेरुलस में रक्त का निस्पंदन उच्च दाब (high pressure) के कारण होता है। अभिवाही धमनिका (afferent arteriole) का व्यास अपवाही धमनिका (efferent arteriole) से अधिक होता है, जिसके कारण ग्लोमेरुलस में रक्त का दबाव बढ़ जाता है।

इस उच्च ग्लोमेरुलर हाइड्रोस्टैटिक प्रेशर (Glomerular Hydrostatic Pressure) के कारण, रक्त में मौजूद जल, ग्लूकोज, अमीनो एसिड, खनिज लवण, यूरिया, यूरिक एसिड जैसे छोटे अणु छनकर बोमन सम्पुट में आ जाते हैं। रक्त कोशिकाएं (RBCs, WBCs) और प्लाज्मा प्रोटीन जैसे बड़े अणु नहीं छन पाते और रक्त में ही रह जाते हैं।

बोमन सम्पुट में एकत्रित इस छने हुए द्रव को ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेट (Glomerular Filtrate) कहते हैं। एक स्वस्थ वयस्क में, ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट (GFR) लगभग 125 mL/minute या 180 लीटर/दिन होता है।

पृष्ठ 5: चयनात्मक पुनरावशोषण (Selective Reabsorption)

3.2 चयनात्मक पुनरावशोषण (Selective Reabsorption)

प्रतिदिन लगभग 180 लीटर ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेट बनता है, लेकिन हम केवल 1 से 1.5 लीटर मूत्र ही उत्सर्जित करते हैं। इसका अर्थ है कि फिल्ट्रेट का लगभग 99% हिस्सा वृक्क नलिकाओं द्वारा पुनः अवशोषित (reabsorbed) कर लिया जाता है। इस प्रक्रिया को चयनात्मक पुनरावशोषण कहते हैं क्योंकि यह शरीर के लिए आवश्यक पदार्थों का चयन करके उन्हें वापस रक्त में भेजती है।

यह प्रक्रिया वृक्क नलिका के विभिन्न भागों में होती है:

  • समीपस्थ कुंडलित नलिका (PCT): यहाँ पर सबसे अधिक पुनरावशोषण होता है। लगभग 70-80% जल और इलेक्ट्रोलाइट्स, और लगभग 100% ग्लूकोज, अमीनो एसिड और विटामिन यहीं पर सक्रिय (active) और निष्क्रिय (passive) परिवहन द्वारा पुनः अवशोषित कर लिए जाते हैं।

  • हेनले का लूप (Loop of Henle): यह मूत्र को सांद्र (concentrated) बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

  • अवरोही भुजा (Descending limb): यह केवल जल के लिए पारगम्य (permeable) होती है, जिससे जल फिल्ट्रेट से बाहर निकलकर मेडुलरी इंटरस्टीशियम (medullary interstitium) में चला जाता है और फिल्ट्रेट सांद्र हो जाता है।

  • आरोही भुजा (Ascending limb): यह जल के लिए अपारगम्य (impermeable) होती है लेकिन सोडियम (Na^+) और क्लोराइड (Cl^-) जैसे इलेक्ट्रोलाइट्स के लिए पारगम्य होती है। यहाँ से NaCl का सक्रिय परिवहन होता है, जिससे फिल्ट्रेट तनु (dilute) हो जाता है।

  • दूरस्थ कुंडलित नलिका (DCT): यहाँ पर जल और सोडियम (Na^+) का सशर्त पुनरावशोषण (conditional reabsorption) होता है, जो हार्मोनल नियंत्रण (hormonal control) पर निर्भर करता है।

पृष्ठ 6: नलिकीय स्रावण और नियमन (Tubular Secretion and Regulation)

3.3 नलिकीय स्रावण (Tubular Secretion)

यह मूत्र निर्माण का अंतिम चरण है। इस प्रक्रिया में, रक्त केशिकाओं (peritubular capillaries) से कुछ अपशिष्ट और अतिरिक्त पदार्थ, जैसे हाइड्रोजन आयन (H^+), पोटेशियम आयन (K^+), अमोनिया (NH_3), और कुछ दवाएं (जैसे पेनिसिलिन) सक्रिय रूप से फिल्ट्रेट में स्रावित (secreted) किए जाते हैं।

यह प्रक्रिया मुख्य रूप से DCT और संग्राहक नलिका (Collecting Duct) में होती है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर में आयनिक संतुलन (ionic balance) और रक्त के अम्ल-क्षार संतुलन (acid-base balance) को बनाए रखना है।

इस चरण के बाद वृक्क नलिका में जो द्रव बचता है, उसे मूत्र (Urine) कहते हैं। यह संग्राहक नलिका से होकर वृक्कीय पेल्विस, मूत्रवाहिनी (ureter) और फिर मूत्राशय (urinary bladder) में जमा होता है, जहाँ से इसे शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।

4. मूत्र निर्माण का नियमन (Regulation of Urine Formation)

वृक्क के कार्य का नियमन हार्मोन द्वारा बहुत सटीक रूप से किया जाता है। यह मुख्य रूप से हाइपोथैलेमस (Hypothalamus), पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland), और अधिवृक्क ग्रंथि (Adrenal Gland) द्वारा नियंत्रित होता है।

4.1 एंटीडाइयूरेटिक हार्मोन (Antidiuretic Hormone - ADH)

  • जब शरीर में पानी की कमी होती है या रक्त का परासरण दाब (osmotic pressure) बढ़ जाता है, तो हाइपोथैलेमस में स्थित ऑस्मोरिसेप्टर्स (osmoreceptors) सक्रिय हो जाते हैं।

  • यह पश्च पीयूष ग्रंथि (posterior pituitary) को ADH स्रावित करने के लिए प्रेरित करता है।

  • ADH, DCT और संग्राहक नलिका की दीवारों को जल के लिए अधिक पारगम्य (permeable) बना देता है।

  • इसके परिणामस्वरूप, फिल्ट्रेट से अधिक जल का पुनरावशोषण होता है, जिससे कम मात्रा में सांद्र (concentrated) मूत्र बनता है और शरीर में जल की कमी पूरी होती है।

पृष्ठ 7: मूत्र निर्माण का नियमन (Regulation of Urine Formation) - जारी

4.2 रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन तंत्र (Renin-Angiotensin-Aldosterone System - RAAS)

यह तंत्र ग्लोमेरुलर रक्त प्रवाह और रक्तचाप (blood pressure) में गिरावट आने पर सक्रिय होता है।

  1. रेनिन का स्राव (Secretion of Renin): GFR या रक्तचाप में कमी होने पर, वृक्क की जक्स्टाग्लोमेरुलर कोशिकाएं (Juxtaglomerular cells) रेनिन (Renin) नामक एंजाइम का स्राव करती हैं।

  2. एंजियोटेंसिन का निर्माण (Formation of Angiotensin): रेनिन, रक्त में मौजूद एंजियोटेंसिनोजन (Angiotensinogen) को एंजियोटेंसिन-I (Angiotensin-I) में बदल देता है। फिर, फेफड़ों से स्रावित ACE (Angiotensin Converting Enzyme) एंजियोटेंसिन-I को एंजियोटेंसिन-II (Angiotensin-II) में बदल देता है।

  3. एंजियोटेंसिन-II के कार्य:

  • यह एक शक्तिशाली वाहिका संकीर्णक (vasoconstrictor) है, जो रक्तचाप को बढ़ाता है।

  • यह अधिवृक्क ग्रंथि (adrenal gland) को एल्डोस्टेरोन (Aldosterone) हार्मोन स्रावित करने के लिए उत्तेजित करता है।

4.3 एल्डोस्टेरोन (Aldosterone)

  • एल्डोस्टेरोन DCT और संग्राहक नलिका पर कार्य करता है।

  • यह इन नलिकाओं से सोडियम आयनों (Na^+) और जल के पुनरावशोषण को बढ़ाता है तथा पोटेशियम आयनों (K^+) के स्रावण को बढ़ाता है।

  • Na^+ और जल के पुनरावशोषण से रक्त का आयतन और रक्तचाप सामान्य हो जाता है।

पृष्ठ 8: मूत्र का संघटन और वृक्क के कार्य (Composition of Urine and Functions of Kidney)

5. सामान्य मूत्र का संघटन (Composition of Normal Urine)

एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति प्रतिदिन औसतन 1 से 1.5 लीटर मूत्र उत्सर्जित करता है। मूत्र एक हल्का पीला, पारदर्शी तरल है जिसका pH मान औसतन 6.0 (थोड़ा अम्लीय) होता है।

सामान्य मूत्र में मुख्य रूप से निम्नलिखित घटक होते हैं:

  • जल (Water): लगभग 95%

  • यूरिया (Urea): लगभग 2% (प्रोटीन चयापचय का मुख्य अपशिष्ट)

  • कार्बनिक पदार्थ (Organic Substances): यूरिक एसिड, क्रिएटिनिन, हिप्यूरिक एसिड।

  • अकार्बनिक लवण (Inorganic Salts): सोडियम, पोटेशियम, क्लोराइड, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फेट और सल्फेट के आयन।

एक स्वस्थ व्यक्ति के मूत्र में ग्लूकोज, प्रोटीन, कीटोन बॉडीज (ketone bodies), या रक्त कोशिकाएं अनुपस्थित होती हैं। इनकी उपस्थिति किसी बीमारी का संकेत हो सकती है।

6. समस्थापन में वृक्क के कार्य (Functions of Kidney in Homeostasis)

वृक्क केवल अपशिष्ट पदार्थों को हटाने का कार्य नहीं करता, बल्कि शरीर के आंतरिक वातावरण (होमियोस्टैसिस) को बनाए रखने में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाता है:

  • परासरणनियमन (Osmoregulation): वृक्क शरीर में जल और इलेक्ट्रोलाइट्स (जैसे Na^+, K^+, Cl^-) की मात्रा को नियंत्रित करके रक्त के परासरण दाब को स्थिर रखता है।

  • अम्ल-क्षार संतुलन (Acid-Base Balance): वृक्क रक्त से अतिरिक्त हाइड्रोजन आयनों (H^+) को स्रावित करके और बाइकार्बोनेट आयनों (HCO_3^-) को पुनः अवशोषित करके रक्त के pH को लगभग 7.4 पर बनाए रखता है।

  • रक्तचाप का नियमन (Regulation of Blood Pressure): RAAS तंत्र के माध्यम से वृक्क रक्तचाप को नियंत्रित करता है।

  • हार्मोन का उत्पादन (Production of Hormones): वृक्क एरिथ्रोपोइटिन (Erythropoietin) हार्मोन का उत्पादन करता है, जो अस्थि मज्जा (bone marrow) में लाल रक्त कोशिकाओं (RBCs) के निर्माण को प्रेरित करता है।

पृष्ठ 9: निष्कर्ष और संदर्भ (Conclusion and References)

7. निष्कर्ष (Conclusion)

अंत में, यह स्पष्ट है कि मूत्र निर्माण एक अत्यंत जटिल और सुव्यवस्थित प्रक्रिया है, जो परानिस्यंदन, चयनात्मक पुनरावशोषण और नलिकीय स्रावण जैसे तीन प्रमुख चरणों के माध्यम से संपन्न होती है। नेफ्रॉन, वृक्क की कार्यात्मक इकाई के रूप में, रक्त को छानने और शरीर के लिए आवश्यक पदार्थों को बनाए रखने का अद्भुत कार्य करता है।

हार्मोनल तंत्र, विशेष रूप से ADH और RAAS, यह सुनिश्चित करते हैं कि शरीर की बदलती जरूरतों के अनुसार मूत्र की मात्रा और सांद्रता को समायोजित किया जा सके। इस प्रकार, वृक्क न केवल एक उत्सर्जन अंग है, बल्कि यह शरीर के आंतरिक वातावरण (होमियोस्टैसिस) को बनाए रखने वाला एक प्रमुख नियामक अंग भी है, जो जल-लवण संतुलन, अम्ल-क्षार संतुलन और रक्तचाप को नियंत्रित करता है। वृक्क का स्वस्थ रहना समग्र स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।

8. चित्र का वर्णन (Diagram Description)

ऊपर दिए गए चित्र में एक नेफ्रॉन की संरचना को दर्शाया गया है, जो वृक्क की कार्यात्मक इकाई है। रक्त अभिवाही धमनिका (Afferent Arteriole) से होकर ग्लोमेरुलस में प्रवेश करता है, जहाँ उच्च दाब के कारण इसका निस्पंदन होता है। छना हुआ द्रव, जिसे फिल्ट्रेट कहते हैं, बोमन सम्पुट (Bowman's Capsule) में एकत्र होता है। यहाँ से यह समीपस्थ कुंडलित नलिका (PCT) में जाता है, जहाँ अधिकांश उपयोगी पदार्थों का पुनरावशोषण होता है। इसके बाद फिल्ट्रेट हेनले के लूप (Loop of Henle) से गुजरता है, जो मूत्र को सांद्र करने में मदद करता है। अंत में, यह दूरस्थ कुंडलित नलिका (DCT) और संग्राहक नलिका (Collecting Duct) से होकर गुजरता है, जहाँ अंतिम समायोजन और स्रावण होता है, जिसके बाद इसे मूत्र कहा जाता है।

9. संदर्भ (References)

  1. Guyton, A.C. & Hall, J.E. (2021). Textbook of Medical Physiology. (14th ed.). Elsevier.

  2. Tortora, G.J. & Derrickson, B.H. (2017). Principles of Anatomy & Physiology. (15th ed.). Wiley.

  3. NCERT. (2022). Biology Textbook for Class XI. National Council of Educational Research and Training, New Delhi.

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